Wednesday, 27 May 2015

अधूरी ख्वाहिशें



ये कुछ ऐसा है जैसे कि जितनी मुॅह उतनी बातें| किसी से सुना था की खुश रहने के दो ही तरीके है| या तो जो चीज पसंद हो उसे हासिल कर लो, या फिर जो हासिल है उसे पसंद कर लो| पर इन दोनों पंक्तियों में एक शब्द सामान है, हासिल| क्या हो जब कोई चीज पसंद आ जाये और आप उसे हासिल न कर पाओ और जो आप के पास हो वो आपको खुश करने के लिए पर्याप्त न हो| ऐसी जाने कितनी बातें है जो आम जिंदगी में लागू नहीं हो पाती और ख्वाहिशें अधूरी रह जाती है| फिर चाहे आप उसे लाख अमल में लाने की कोशिश कर लो, मैंने भी की थी, पर सफल न हो पाया| एक पल में जिंदगी ने यूँ करवट ली और सब बदल गया| खैर इस मोड़ पर आ कर बीते वक़्त को मैं बदल तो नहीं सकता| बस उस वजह को जानने की कोशिश कर रहा हूँ कि सब कुछ जानने के बाद भी, हर कदम संभल कर रखने के बात भी ख्वाहिशें क्यों अधूरी रह जाती है|
कहानी बहुत लम्बी या बहुत पुरानी नहीं है| करीब साल-दो-साल पहले मेरी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया जिसने लगभग मुझे हिला कर रख दिया था| ऐसा नहीं है कि मैं पहले इंसान था जिसके सामने मुश्किल हालात थे| पूरी जिंदगी में कभी न कभी हर किसी को ऐसे वक़्त से गुजरना पड़ता है| पर शायद ये मेरी जिंदगी का वो हिस्सा है जो, जिस वजह को मैं जानने की कोशिश कर रहा हूँ, उसका जवाब कहीं न कहीं इसी में छुपा है| मैं इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था और ये मेरा आखिरी साल था| सब कुछ सामान्य रूप से चल रहा था, जैसा कि हर एक स्टूडेंट के साथ होता है| मैं भी मन से पढ़ाई कर रहा था और अपने सुनहरे भविष्य के सपने देख रहा था| कि तभी अचानक एक दिन मेरे फ़ोन की घंटी बजी और दूसरी तरफ से जो आवाज आई उसने मुझे हिला कर रख दिया| फ़ोन पर दूसरी तरफ मेरे पापा थे और भर्रायी हुयी आवाज में उन्होंने बस इतना कहा कि जितनी जल्दी हो सके घर आ जाओ| तुम्हारी माँ इस वक़्त कोमा में है और अस्पताल में अपनी आखिरी साँसें गिन रही है| एक पल तो ऐसा लगा जैसे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया हो| समझ नहीं आ रहा था क्या करूॅ| अगले दिन मेरे सेमेस्टर का पेपर था| मेरा घर मेरे कॉलेज से 1400 किलोमीटर दूर था| शाम के चार बज रहे थे| 18 घंटे बाद मेरा पेपर था और लगातार 36 घंटे ट्रैन से सफर के बाद मैं अपने घर के दरवाजे पे खड़ा था| पेपर छोड़ के आ गया था मैं और मेरे सामने माँ की लाश पड़ी थी| मुझे मेरी माँ सबसे अजीज थी| केवल इसलिए नहीं कि उन्होंने मुझे जन्म दिया था बल्कि इसलिए कि वो मेरी सबसे बड़ी ख्वाहिश का एक अहम हिस्सा थी| बचपन से ही मैं घर से और घरवालों से दूर रहा था अपनी पढ़ाई की वजह से| इसलिए ये मेरी जिंदगी का मकसद बन गया था कि पढ़ाई पूरी होते ही मैं जहाँ भी रहूँगा अपने पूरे परिवार के साथ रहूँगा| और मैं एकदम कगार पर पहुँच चुॅका था कि तभी....मैं तो इतना बदनसीब था कि आखिरी पल में उन्हें देखना तो दूर, उनकी आवाज़ तक नहीं सुन पाया था|
मैंने इकलौता बेटा होने का फ़र्ज़ अदा किया| माताजी के शव को अग्नि-अर्पण किया और गंगाजी में अस्थि विसर्जित कर दी| कुछ दिनों तक तो गंगा की लहरों में अपनी माँ को ढूंढता रहा| घंटों किनारे सीढ़ियों पर बैठकर| और फिर पापा को समझा बुझाकर वापस आ गया अपना कैरियर बनाने|
पिछले कुछ दिनों में मैं दो महत्वपूर्ण चीजें खो चुका था| एक मेरी माँ जो मेरे जीने का सहारा थी और दूसरा, मेरा कैरियर जो जीने के लिए जरुरी था| सेमेस्टर का रिजल्ट आ चुका था और मैं दो पेपर में, अनुपस्थित रहने की वजह से फेल कर दिया गया था| कहने को तो मेरी चार साल की इंजीनियरिंग पूरी हो गयी थी पर मेरी ख्वाहिशों की तरह ये भी अधूरी रह गयी थी| कॉलेज ख़त्म होने के बाद सारे दोस्त भी बिछड़ गए और मैं खुद को इस शहर में बिलकुल अकेला महसूस करने लगा| इस वक्त मुझे किसी के सहारे की बेहद जरुरत थी| और अब मेरे पास केवल एक हथियार बच रहा था| दरअसल कॉलेज में एक मेरी दोस्त थी, बहुत अच्छी दोस्त| सच कहूँ तो मेरे लिए वो दोस्त से बढ़ कर थी पर मैंने कभी अपने जज्बात उसके सामने जाहिर नहीं होने दिए| पर आज मैं खुद को रोक नहीं पाया और मैंने उसे मिलने बुलाया, सोचा शायद दर्द बांटने से मन कुछ हल्का हो जाए और पुरानी दोस्ती में एक नयी जान आ जाए| किसे पता था कि ये मेरी उस से आखिरी मुलाकात होगी| उस दिन हम मिले जरूर थे पर जितनी देर वो मेरे सामने बैठी थी ऐसा लगा मैं किसी अजनबी से बात कर रहा हूँ| यकीन नहीं हो रहा था कि ये वही लड़की है जिसके साथ मैंने चार साल गुजारे है, एक कॉलेज में एक साथ एक ही बेंच पर| उसके आखिरी शब्द मुझे अब भी याद है...."मुझे तुम्हारी माँ की मौत का बेहद अफ़सोस है| मैं अब तुमसे कभी मिल नहीं सकती| हमारी दोस्ती कॉलेज तक ही थी| सच तो ये है की मैं तुम्हें कभी समझ नहीं पायी| मैं बस जा रही हूँ हमेशा के लिए| अपना ख्याल रखना....|"
ये मेरे लिए तीसरा झटका था| लगातार तीन झटकें, वो भी इतने कम समय में| कहते है मजबूत से मजबूत दिवार भी लगातार के झटकों से टूट जाती है| और फिर मैं तो इंसान था| सचमुच टूट चुका था मैं बुरी तरह| कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी| सब कुछ भारी सा हो गया था| और फिर मेरे अंदर एक अजीब सा ख्याल पनपने लगा| कि जो चीज मुझे प्यारी होती है वो छिन जाती है और किसी चीज की ख्वाहिश करूॅ तो वो पूरी नहीं होती| मैंने कसम खा ली कि अब किसी भी चीज की ख्वाहिश नहीं करूँगा| खुद को जिंदगी के हवाले कर दिया| वक्त चाहे जैसे नचाये मैं नाचने को तैयार था|
मैंने अपनी दिनचर्या बदल ली| कहीं फिर से दिल में कोई अरमान ना जाग उठे, इसलिए खुद को व्यस्त रखने लगा| कंप्यूटर ब्रांच से इंजीनियरिंग की थी| और पढ़ाई भी ढंग से की थी| इसलिए काम मिलना मेरे लिए इतना मुश्किल नहीं था| जो भी प्रोजेक्ट हाथ लग जाए उसमें जी जान लगा देता| धीरे-धीरे मैं अपने काम में व्यस्त होता गया, मेरे सारे पेपर्स भी क्लियर हो गए और इंजीनियरिंग की डिग्री भी आ गयी| और फिर कुछ दिनों बाद एक अच्छी कंपनी से परमानेंट जॉब का ऑफर भी आ गया| मैंने नौकरी ज्वाइन कर ली| एक बार को लगा अब सब ठीक है| एक मध्यवर्गीय परिवार के लड़के को और क्या चाहिए? सब कुछ तो है| पर मैं गलत था| असल में मैं खुद को खो चुका था| अपनी पहचान खो दी थी| हॅसना तक भूल गया था| जिन्दा था बस, जीना भूल गया था| एक दिन खुद से सवाल भी किया....क्या मैं खुश हूँ? अंदर से कोई जवाब नहीं आया| क्यूॅकि न तो मेरे पास खुश होने की कोई वजह थी और न ही मैं खुश था| बस चेहरे पर एक नकाब लिए घूम रहा था, एक मुस्कुराता चेहरा| पर अंदर इतने घाव दफन थे कि मुझे कोई ऐसी वजह नजर नहीं आ रही थी जो इनको भर सके और होंठो पर सच्ची मुस्कान ला सके|
मैं अपनी इस नयी नौकरी से खुश था या नहीं मुझे नहीं पता| पर यहाँ पर एक बात अच्छी थी कि यहाँ मुझे कुछ अच्छे लोगों के साथ काम करने का मौका मिला था| लड़कों के साथ-साथ हमारी इस टीम में कुछ लड़कियां भी थी| पर मेरी दिलचस्पी केवल मेरे काम में थी| धीरे-धीरे कुछ वक्त और निकल गया| मेरी उम्र बहुत ज्यादा नहीं थी| मैं बस 25 का था| फिर भी काम बोलना, ज्यादा किसी से मतलब न रखना मेरी आदत सी हो गयी थी| इन दिनों मेरी मेरे कंपनी के बिज़नेस-हेड से खूब बन ने लगी थी| ऑफिस से आते वक़्त कई बार वो मुझे मेरे रूम तक खुद की कार से छोड़ आया करते थे| एक-दो बार तो मैं उनके फ्लैट पे भी हो आया था| उनको मेरे बारे में ज्यादा तो नहीं पता था, पर शायद अनुभव की वजह से उन्हें मेरे अकेलेपन का आभास हो गया था| मजाक-मजाक में कई बार वो मेरे से कह भी दिया करते कि कोई अच्छी-सी लड़की पटा लो, सारी परेशानी दूर हो जाएगी| मैं बस मुस्कुरा कर रह जाता|
एक दिन की बात है| मैं अभी ऑफिस से निकला ही था कि उन्होंने बोला - "आओ तुम्हे घर ड्राॅप कर दूॅ|" और फिर रास्ते में उन्होंने बताया कि - "कल मैं तुम्हारे लिए ऑफिस में एक नयी लड़की लेकर आ रहा हूँ|" और मैंने हर बार की तरह उनकी इस बात को मजाक में ही लिया|
अगले दिन ज्यों ही मैं ऑफिस पहुंचा सचमुच हमारे ऑफिस में एक नयी लड़की आई थी| उसने आज ही ज्वाइनिंग ली थी एच. आर. मैनेजर के पोस्ट पर| तो सर की बात सच थी| मैं मन ही मन मुस्कुरा उठा था| वैसे तो हमारे इंजीनियरिंग में एक कहावत थी कि एक इंजीनियर और एक एम. बी.ए. की आपस में कभी नहीं बनती, जो आगे चल कर कुछ हद तक सच भी हुयी| पर वो पल मेरे लिए कुछ ख़ास था| मैंने पहली बार किसी को पहली मुलाक़ात में ही इस हद तक नोटिस किया था| यहाँ तक कि मुझे आज भी उसकी एक- एक बात याद है| वो मेरे सामने थी, सफ़ेद और हलके हरे रंग के सलवार सूट में| उसके बाल खुले हुए और हलके गीले थे, जैसे अभी- अभी नहा धोकर आई हो| थोड़ी सुरमयी सी आँखें, शायद कोई अच्छा सा आई-लाइनर लगाया हुआ था| जब वो अपना परिचय दे रही थी तो पहली बार उसके पतले होंठ हिले थे, पर ऐसा लग रहा था जैसे शब्द मेरे कानों तक पहुँच ही नहीं पा रहे हो|  एक अजीब-सा आकर्षण था उसके चेहरे पे, और वो पल जैसे ठहर-सा गया था मेरे लिए| बस जेहन में एक ही बात बार-बार आ रही थी कि क्या ये मेरी ख़ुशी की वजह बन सकती है| और मैं गलत भी नहीं था, इस वक़्त जो मेरे होंठो पे मुस्कान थी वो बनावटी नहीं थी| अरसे बाद एक उम्मीद की किरण नजर आई थी| एक बार को फिर से जीने को मन मचल उठा था| जाने उस एक पल में क्या- क्या सोच बैठा था मैं| एक झटके से मैं अपनी ख्यालों की दुनिया से बाहर आया और खुद को सँभाला कि कहीं मेरी चोरी ना पकड़ी जाए| मैं डर भी रहा था कि कहीं उसने मेरी आँखों में छिपी मेरी भावनाओं को पढ़ तो नहीं लिया, पर शायद उसने मेरी तरफ इतना गौर नहीं किया था| सभी अपने- अपने काम में लग गए थे और फिर मैं भी अपनी रोज की दिनचर्या का एक हिस्सा बन गया|
पल-दर-पल वक़्त बीतता जा रहा था, पर मेरे दिल में उसके लिए भावनाएँ कम नहीं हो पा रही थी| बल्कि और जोर पकड़ती जा रही थी| मेरी उससे कुछ ख़ास बात भी नहीं हो पाती, क्यूँकि हम दोनों का डिपार्टमेंट अलग था| बस सुबह की गुड मॉर्निंग और शाम में जाते वक़्त बाय, इस से ज्यादा कुछ नहीं| पर ये मेरे लिए काफी नहीं था| मैं इस से ज्यादा चाहता था, गुड मॉर्निंग और बाय के बीच का जो वक़्त था, उसमें से कुछ पल चुराना चाहता था और वो पल उसके साथ बिताना चाहता था| पर ये मेरे वश में नहीं था| ख्वाहिश तो थी मगर उसे पूरा करने की हिम्मत नहीं थी| एक डर था अंदर ही अंदर कि कहीं मेरी बाकी ख्वाहिशों की तरह ये भी अधूरी न रह जाए| बस खुद को तसल्ली देने के लिए जो मैं कर सकता था वो मैं करता था| उसका केबिन ठीक मेरे पीछे था और कांच में से वो साफ़ नजर आती थी| मैं हर कुछ देर में पीछे पलट कर उसे बस एक बार देख लेता| साथ में मुझे डर भी था कि कहीं मेरी चोरी पकड़ी ना जाये| मुझे बाकी लोगों की परवाह नहीं थी, बस जाने क्यों मैं उसे भी नहीं जताना चाहता था| तो ऐसा क्या किया जाए जिससे मैं उसे जी भर के देख भी लूँ और मुझे पीछे भी न पलटना पड़े| मैंने इसका भी रास्ता ढूंढ लिया| मैंने मेरे कंप्यूटर के स्क्रीन की चमक बढ़ा दी और उस पर काले रंग का वॉलपेपर लगा दिया| अब मुझे पीछे पलटने की जरुरत नहीं थी| जब भी उसे देखने का मन करता मैं स्क्रीन पर अपनी नज़रें गड़ा देता और मेरे पीछे बैठी उसकी तस्वीर आईने की तरह मेरे कंप्यूटर की स्क्रीन पर उभर आती| चोर नज़रों से मैं दिन भर उसे घूरता रहता पर जब भी वो मेरे सामने से गुजरती मैं बस अपनी पलकें झुकाये चुपचाप निकल जाता और फिर उसके थोड़ा आगे निकल जाने पर वापस पलट कर उसे देखता|
उस दिन पहली बार उससे मेरी बात हुयी| मुझे किसी ने आकर बताया कि एच. आर. मैडम आपको बुला रही है| एक बार तो मैं सकपका गया| हमेशा उसके पास होना चाहता था, फिर भी जाने क्यों उसके पास जाने से डरता था| उसके कंप्यूटर में कोई तकनीकी खराबी आ गयी थी, इसलिए बुलाया था| वैसे तो मैं सॉफ्टवेयर इंजीनियर था, पर उसको लगा होगा कि शायद मैं ठीक कर पाऊँ| खैर समस्या दूर हो गयी और बदले में उसने थैंक्स बोला| मैंने भी मुस्कुरा भर दिया और वापस अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गया| केवल थैंक्स?? मुझे गुस्सा आ रहा था, उस से ज्यादा खुद पर| मैंने भी तो बात करने की कोशिश नहीं की| पर अब कर भी क्या सकता था| एक मौका आया था और वो भी हाथ से निकल गया|
उस दिन वीकेंड था, फन फ्राइडे| इस मौके पर हम सारे ऑफिस स्टाफ इकट्ठे होकर थोड़ी मस्ती किया करते और एक -दूसरे को और करीब से जानने का मौका भी मिल जाता| तो उस दिन हम लोगों ने कुछ इस तरह का खेल चुना कि आज हर कोई अपने बारे में एक राज की बात बताएगा| धीरे-धीरे सब का नंबर आता गया और सभी ने अपने बारे में कुछ न कुछ राज खोले| मेरे से पहले उसकी बारी आई. और मैं तो कब से बेताब था इसके राज जानने के लिए| उस दिन.....उसने पहली बार अपने अफेयर के बारे में बताया, और ये भी कि वो इस रिश्ते को लेकर बहुत गंभीर है| सभी खुश थे, शायद वो भी और सभी उसके हिम्मत और हौसले की दाद भी दे रहे थे| और मैं.......मेरे सामने से एक झटके में सब कुछ गायब हो गया था| उस पल मैं क्या महसूस कर रहा था ये बताने के लिए शायद मेरे पास शब्द कम पड़ जाए| बस कुछ ऐसा था कि अभी-अभी सूखी पड़ी जमीन के ऊपर कुछ काले बादल मंडराएँ थे, मगर इससे पहले कि वे बरस पाते, एक तेज हवा का झोंका आया और उसे उड़ा कर ले गया| सब ख़त्म| उम्मीद की आखिरी किरण भी अब जा चुकी थी| मैं वापस पहले जैसा बन गया और फिर से चेहरे पर नकाब डाल कर घूमने लगा| अब तो मुस्कुराने का भी आदी हो गया था|  कुछ भी तो नहीं बदला| न ही किसी को फर्क पड़ा|
कुछ तो बदला था, थोड़ा सा ही सही, पर बदला था| मैं बदला था, मेरा रवैया बदल गया था| हमारी अक्सर मीटिंग हुआ करती थी| और किसी भी मीटिंग में मैं उसकी यानि अपने एच. आर. की बातों से सहमत नहीं हो पाता| थोड़ा चिढ़चिढ़ा सा हो गया था मैं| उसकी हर बात नकार देता| क्यों कर रहा था मैं ऐसा?? अक्सर हमारी लड़ाईयाँ भी हो जाती| सब को यही लगता कि ये एक इंजीनियर और एक एम. बी.ए. की लड़ाई है| पर असली वजह कोई नहीं जानता| मैं बस उससे नफरत करना चाहता था और ये भी चाहता था कि वो भी मुझसे नफरत करे| पर क्या सच में मैं ऐसा चाहता था? ये तो बस मेरा गुस्सा था| मैं दिल से कभी नहीं चाहता कि वो मुझसे नफरत करे| और मैं ये भी जानता था कि वो मुझसे प्यार करे, ऐसा सम्भव नहीं|
कुछ दिन यूँ ही चलता रहा| मैं चाह कर भी उस से नफरत नहीं कर पाया| वो थी ही इतनी प्यारी| उसमे कुछ तो बात थी| ऑफिस की पूरी टीम को उसने बाँध रखा था| सही मायने में वो एक टीम लीडर थी| मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इससे अच्छी एच. आर. इस कंपनी को कभी नहीं मिल सकता| उसके जादू से मैं भी नहीं बच पाया| उसने बहुत हद तक मुझे भी बदल दिया था| अब हमारी लड़ाईयाँ नहीं होती| किसी को भी इस लड़की से कभी कोई शिकायत नहीं रहती| फिर भला मुझे कैसे होती, मैं तो.....| अब मैं भी उसकी बातों से सहमत रहने लगा था| कई बार उसने मुझे जताया भी कि "मैंने तुम्हें बदल दिया|" और मैं भी कह देता "हाँ, सचमुच तुमने मुझे बदल दिया|" मगर अपनी भावनाओं को कैसे बदलूँ? नहीं बदल सकता| पहले तो बस उससे प्यार करता था, मगर अब तो मैं उसकी इज्जत भी करने लगा था| मेरे दिल में उसने अपनी एक खास जगह बना ली थी| जब वो बात करती तो मैं बस उसे देखता रहता, कभी उसकी आँखों में तो कभी उसके हिलते होंठों को| जब वो मुझसे दूर होती तो ऐसा लगता उसे मेरे पास होना चाहिए, यहाँ मेरे बगल में| मैं बस एक बार उसे छूना चाहता था, उसे महसूस करना चाहता था.....अपनी अँगुलियों से उसके चेहरे पर से बालों को हटाना चाहता था| मुझे पता था ऐसा कभी नहीं होगा....और मेरी एक और ख्वाहिश अधूरी रह जाएगी| मैं उसे अपने दिल की बात कभी कह नहीं पाया और वो मेरे मौन इजहार को कभी समझ नहीं पायी|
आज ऑफिस में फिर से एक नयी लड़की की ज्वाइनिंग थी| उसका आज पहला दिन था| ऑफिस से छूटते वक़्त हम दोनों साथ ही निकले थे| दोनों को एक ही बस स्टॉप तक जाना था| हम दोनों चहलकदमी करते हुए बातें करते हुए जा रहे थे| वो ठीक मेरे साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही थी| शायद वो कुछ कह रही थी और मैं सुन भी रहा था| मैंने आँख उठाकर एक बार उसकी तरफ देखा| वही आँखें, वही होंठ, वही अंदाज| मेरे बगल में जो लड़की ठीक मेरे साथ चल रही थी ये वो नयी लड़की नहीं थी| ये बस एक एहसास भर था या कोई जादू, मुझे नहीं पता| एक बार के लिए ऐसा लगा सब कुछ ठहर सा गया हो| ये पल बहुत ही खूबसूरत था| बातों - बातों में बस स्टॉप आ गया था| वो बस के अंदर जा चुकी थी और मैं जाती हुयी बस को देखता रहा| मेरी ख्वाहिशों की फेहरिस्त में एक और अधूरी ख्वाहिश जुड़ चुकी थी| मगर इस बार ये अधूरी क्यों थी, इसका जवाब मेरे पास था| मैंने ऐसी चीज की ख्वाहिश कर ली थी जो कभी मेरी थी ही नहीं| और जो चीज अपनी न हो, उसके खोने पर गम कैसा|

बस जा चुकी थी और मैं धीरे-धीरे अपने मंज़िल की और चल पड़ा……..|

Sunday, 10 May 2015

जज्बात न.1

एक ख़ुशी है जो किस्तों में भी नसीब नहीं,
एक गम का खजाना है जो कभी खाली नहीं होता...
एक ये होंठ है जो मुस्कुराने का आदी है,
एक ये आँखें है जिनमें कभी पानी नहीं होता....!!!

Saturday, 9 May 2015

अनजानी-सी वजह


जाने कबसे ढूंढ रहा हूँ,
अभी तक मिला नहीं,
आखिर क्या ढूंढ रहा हूँ,
ये भी पता नहीं,
न ठौर है ना ठिकाना,
ना कोई तैयारी है,
बस मन में एक आस है,
और तलाश जारी है...
अब तक मैंने जो भी खोया,
उसका कोई हिसाब नहीं,
कोई अगर पूछे कि क्या पाया,
इसका भी जवाब नहीं,
कोई तो है मेरा बहुत अपना,
कुछ है जो ख़ास है,
शायद कही खो गया है,
जाने किसके पास है,
कभी दिन के तेज उजाले में,
कभी काली रात में,
कभी चिलचिलाती धूप में,
तो कभी बरसात में,
बस उसे ही ढूंढता जाता हूँ,
जो है भी कि नहीं,
एक अनजानी सी वजह है ये,
पूरी होगी कि नहीं,
मन बेचैन है दिल डरा हुआ,
पलकें भारी है,
एक अनबुझी-सी प्यास है सीने में,
और तलाश जारी है !!!