Tuesday, 27 January 2015

खौफ




        गत रात मुझे नींद नहीं आ रही थी| हालाँकि अभी रात भी कुछ खास नहीं हुई थी, फिर भी मैं दिन भर की थकान को मिटाने के लिए सोने की चेष्टा कर रहा था| गाँव में वैसे भी लोग जल्दी सो जाते है| लेकिन जब मेरी चेष्टा व्यर्थ गई तब मैं टेबल लैम्प जलाकर लिखने बैठ गया| मैंने लिखने की टेबल खिड़की के पास लगा रखी थी| मैंने खिड़की से बाहर झाँककर देखा| बाहर काफी सन्नाटा व्याप्त था| लेकिन सामने ईख की खेतों में हलचल हो रही थी और चाँदनी रात के कारण मैं सब कुछ स्पष्ट देख पा रहा था| वैसे यह हलचल मेरे इलाके में एक आम बात थी| ईख की कटाई चल रही थी| पहाड़ी के उस पार आदिवासियों की एक बस्ती थी, जहाँ से लोग आकर रात-रात भर कटाई का काम करते थे| बदले में खेत का मालिक उसे अच्छी-खासी मजदूरी देता था| इन आदिवासियों की एक खास बात थी कि रात में इनका हाथ ज्यादा तेज चलता था| नशे में धुत्त होकर ये बड़े ही जतन से कटाई करते थे| कुछ देर तक तो मैं उन्हें ही देखता रहा, फिर लिखने में रम गया| और फिर ना जाने कब तक लिखता रहा|

      रात के लगभग साढ़े ग्यारह बज चुके थे| मैं अब तक लिख रहा था| तभी मैंने गाड़ियों के गड़गड़ाहट की आवाज़ सुनी| मैंने गर्दन उठाकर खिड़की से बाहर देखा| सामने कच्चे रास्ते से होकर एक जीप गन्ने के खेत की तरफ आ रही थी| मैंने सोचा खेत का मालिक मुआयना करने आया होगा, और फिर लिखने लग गया| तभी कुछ देर बाद गोलियों के तड़तड़ाहट की आवाज़ आई और साथ ही कुछ लोगों की चीखें भी सुनाई दी| मैं बौखला गया | मारे खौफ के मेरी आँखें फ़ैल गई| सामने कई लाशें बिछी पड़ी थी और आस-पास ही कई सारे वर्दीधारी पुलिस वाले खड़े थे| पास ही में एक पुलिस जीप भी खड़ी थी| सारा माजरा मेरी समझ में आ चुका था| खेत का मालिक ईख की कटाई के आड़ में तस्करी का धंधा करता था| बदले में अनपढ़ गँवार आदिवासियों को जान गंवानी पड़ी| मैंने सोचा मामला अब थम गया है| पुलिस लाशों को इकठ्ठा कर रही थी| इतने में एक भयानक आवाज सुनाई पड़ी| गन्ने की सरसराहट को चीरता हुआ एक आदमी निकला और गड़ासे से एक पुलिसवाले का गर्दन धड़ से अलग कर दिया| साथ ही बड़ी फुर्ती से उसकी बंदूक लेकर बाकियों को भी वही ढेर कर दिया| अपने साथियों की मौत देखकर वह शायद पागल-सा हो गया था| सारे पुलिसवालों को मारकर भी वह बुरी तरह गुर्रा रह था और उसके हाथ में खून से सना गड़ासा चमक रहा था| बाकी सब तो ढेर हो चुके थे, पर शायद इंस्पेक्टर की साँसे अब भी चल रही थी और वह कराह रहा था| वह खूनी दरिंदा उस इंस्पेक्टर की तरफ बढ़ा और गड़ासे से उसके छोटे-छोटे टुकड़े करने लगा| इंस्पेक्टर की चीख पूरी पहाड़ी में गूंज उठी और सन्नाटे का कलेजा भी दहल उठा| मगर वह वहशी थमने का नाम ही नहीं ले रहा था| ऐसा वीभत्स नज़ारा देखकर मेरी रूह तक काँप उठी थी| मेरी चीख निकलते –निकलते रह गई थी| वह इंस्पेक्टर दर्द की ज्यादती की वजह से शायद दम तोड़ चुका था| उस जंगली ने जब देखा कि उसमें कोई हलचल नहीं हो रही है तब वह जानवरों की तरह चीखने लगा और उस इंस्पेक्टर के पुरे जिस्म को चीर डाला|

      “ आ............|”
      तभी मैंने एक चीख सुनी|
“ अरे, यह तो छोटी की चीख है| ”

डर के मारे मेरी हलक तक सूख गई और मैं बगल के कमरे की तरफ भागा| जाते-जाते मैंने चाँदनी रात में उस दरिंदे का चेहरा देखा| उसकी आँखें भेड़िये-सी चमक रही थी| चीख सुनकर उसका ध्यान हमारी तरफ खींच गया था| एक तो उसका चेहरा काफी भयानक था, ऊपर से खून के छीटों ने उसे और भी विकराल बना दिया था|

“ क्या हुआ छोटी? ”

मैंने देखा छोटी बुरी तरह काँप रही थी और एकटक खिड़की से बाहर देख रही थी| ऐसा खौफनाक मंजर देखकर वह बुरी तरह डर गई थी| डर तो मैं भी गया था और फिर वह तो मात्र बारह साल की एक बच्ची थी|

“ डरो मत, तुम्हें कुछ नहीं होगा| ”- कहकर मैंने छोटी को अपने कलेजे से लगा लिया| छोटी मेरी इकलौती बहन थी| माँ-बाप के गुजरने के बाद मैं ही उसका सब कुछ था और वो मेरी| इसलिए मुझे हमेशा उसकी फ़िक्र लगी रहती थी| पर छोटी तो सो रही थी| फिर मैंने सोचा शायद गोलियों की आवाज़ सुनकर वह जग गई हो| गलती मेरी थी| खौफजदा होने के कारण मैंने ही छोटी का खयाल नहीं किया और उसे भी इस खौफ का सामना करना पड़ा| मैं उसके बालों को सहलाने लगा|

“ भ....भैया| ”
“ क्या? ”

छोटी खिड़की की तरफ अंगुली से इशारा कर रही थी| मैंने देखा वह दरिंदा इस तरफ ही आ रहा था| अब क्या किया जाये? मैं काँप उठा| एक तो पहाड़ी इलाके में वैसे भी घर दूर-दूर होते हैं, ऊपर से अपने लेखन के शौक के कारण मैंने अपना घर गाँव से बाहर की तरफ बनवाया था| इस वक्त मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था| मैंने छोटी को तसल्ली देते हुए कहा-

“ वह अपने घर वापस जा रहा है| वैसे भी दरवाजा भीतर से बंद है| तुम सो जाओ, मैं खिड़की बंद कर देता हूँ| ”

मैं खिड़की बंद करने लगा| साथ ही साथ मैं यह भी सोच रहा था कि अगर वह सचमुच यहाँ आ गया तब क्या होगा? मगर यह क्या? खिड़की बंद कर मैं ज्यों ही वापस पलटा छोटी कमरे में नहीं थी| उसे आवाज लगाते हुए मैंने पूरा घर छान मारा मगर वो नहीं मिली| मेरा मन आशंकित हो उठा| मैं मुख्य दरवाजे की तरफ गया| दरवाजा खुला पड़ा था| तो क्या छोटी......| मैं भीतर-ही-भीतर रो पड़ा| टॉर्च लेकर मैं उसे ढूंढने निकल पड़ा| एक तरफ वह दरिंदा हाथ में खून से सना गड़ासा लिए घूम रहा था, दूसरी तरफ छोटी गायब थी| एक तरफ मौत का खौफ तो दूसरी तरफ छोटी को खोने का खौफ| मैं छोटी-छोटी पुकारता हुआ उसे ढूंढने लगा| इस वक्त मुझे खुद से ज्यादा छोटी की परवाह हो रही थी| उसे ढूंढते-ढूंढते मैं पहाड़ी के पास वाले मंदिर तक पहुँच गया| मंदिर के बरामदे में भी खोजा पर वो नहीं मिली|

“ खच्च.....| ”

तभी मंदिर के पिछले हिस्से से किसी चीज के कटने की आवाज़ आई| किसी अनहोनी के डर से मैं भीतर तक सहम गया और लपक कर पीछे की तरफ भागा| वहाँ का नजारा देख कर मेरे मुँह से घुंटी-घुंटी चीख निकल पड़ी| सामने उस दरिंदे की लाश पड़ी थी और छोटी के हाथ में खून से सना गड़ासा था| उसने उस दरिंदे के छोटे-छोटे टुकड़े कर दिए थे, एक-एक हाथ-पैर काट कर अलग कर दिया था जैसा कि उस दरिंदे ने उस इंस्पेक्टर के साथ किया था| छोटी ने उसे जैसा करते हुए देखा था, वह खौफ बनकर उसकी आँखों में बस गया था और यही खौफ अब उस पर हावी हो चुका था| यह सब देखकर मैं लगभग पागल हो चुका था| मैं बुरी तरह चीखने-चिल्लाने लगा| तभी छोटी ने गड़ासा हवा में लहराया और जोर से उस दरिंदे की गर्दन पर दे मारा| खून के छीटों ने मेरे चेहरे को बुरी तरह भींगो दिया और मेरी आँख खुल गई| मैंने देखा छोटी खिल-खिलाकर हँस रही थी और मेरे मुँह पर पानी के छीटें मार रही थी|


अच्छा हुआ कि यह खौफ महज एक सपना था|      

चित्रकार

मुझे बचपन से ही चित्रकारी का बेहद शौक रहा है| सच कहूँ तो चित्रकारी केवल मेरा शौक ही नहीं, बल्कि मेरा वजूद है| हर इंसान के अपने अलग-अलग शौक होते हैं और ऐसे ही किसी एक शौक में जब जुनून का मिश्रण हो जाता है तो वह उसका वजूद बन जाता है| यही बात मेरे साथ भी थी| जहाँ तक मैं चित्रकारी को समझता हूँ तो यह केवल एक कला नहीं है| एक चित्रकार जब अपनी भावनाओं और रचनात्मकता को मिलाकर तूलिका के माध्यम से कैनवास के पन्नों पर एक सजीव आकार देने की कोशिश करता है तो चित्र का निर्माण होता है और एक चित्रकार की इसी खूबी को चित्रकारी कहते है| एक सम्पूर्ण चित्र केवल कई रंगों का मेल नहीं, बल्कि एक चित्रकार की सोच, उसकी भावनाओं और उसके सपनों का सम्मिश्रण होता है|

चित्रकारी का मेरा यह शौक दिन-ब-दिन परवान चढ़ता जा रहा है| इसकी कई वजहें हैं| एक तो मुझे सपनों में जीने की आदत है| दूसरी यह की मैं आर्थिक रूप से काफी समृद्ध कहा जा सकता हूँ; क्यूंकि मेरे पिताजी का बसाया हुआ काफी बड़ा बिजनेस है, इसलिए मुझे सपनों की दुनिया में खोने के लिए काफी वक्त मिल जाता है| बिजनेस में मेरी दिलचस्पी जरा भी नहीं है और ना ही मैं वक्त का पाबन्द हूँ| चित्रकारी के प्रति मेरी दीवानगी की जो सबसे बड़ी वजह है, वह है मेरे जेहन में कैद एक तस्वीर; जो कि बहुत स्पष्ट-सा नहीं है, और न ही मैं उससे कभी रूबरू हुआ हूँ| फिर भी वह मुझे प्रेरणा देती है, मेरी कल्पना को सहारा देती है और मेरी अँगुलियों को तूलिका पकड़ने तथा कैनवास पर फिसलने के लिए बाध्य करती है|

यूँ तो मैं हर तरह की तस्वीरें बनाता हूँ, परन्तु जब भी मैं किसी लड़की के अक्स को पन्ने पर उतारने की कोशिश करता हूँ तो हर बार मेरी अंगुलियां धोखा दे जाती है| बाकी सब कुछ तो ठीक-ठाक ही बनता है, परन्तु हर बार वही जुल्फें, वही नाक, वही ऑंखें और वही होंठ| मैं समझ नहीं पाता कि हर बार एक-सा चेहरा क्यूँ? आखिर कहाँ चूक हो जाती है? कहीं ये वही तस्वीर तो नहीं जो मेरी जेहन में कैद है? कहीं ये वही चेहरा तो नहीं जो मेरी सोच में धुँधली-सी है, मगर तूलिका के हाथ में आते ही मुझ पर हावी हो जाती है| कभी-कभी तो मैं खुद से ही सवाल करने लगता- ये महज एक कल्पना है या फिर हकीकत? मेरा दिल इसे केवल कोरी कल्पना मानने को तैयार नहीं था| और फिर मैंने अपनी कल्पना को वास्तविक दुनिया में ढूंढना शुरू कर दिया| हर रोज मैं अलग-अलग जगहों पर जाकर चित्रकारी करने लगा| कभी किसी नदी के किनारे तो कभी कुदरत की गोद में पर्वत-मालाओं की बीच, कभी किसी घने जंगल में तो कभी दूर तक फैले क्षितिज तले हरी घास के मैदान में|

रोज की भांति मैंने सारा सामान गाड़ी में डाला और अपनी कल्पना की खोज में निकल पड़ा| शहर के कोलाहल से दूर मैंने एक शांत जगह देखकर गाड़ी खड़ी की और चित्रकारी का सारा सामान लेकर सामने बगीचे की तरफ चल पड़ा| एक घने छायादार वृक्ष के नीचे मैंने अपना पड़ाव डाला| फिर एक सनसनी निगाह चारों तरफ दौड़ाई| दरअसल मैं उस लोकेशन को तलाश रहा था जिसकी तस्वीर उतार सकूँ| तभी मेरी निगाह सामने बेंच पर बैठी एक लड़की पर ठहर गई| मैंने सोचा क्यूँ ना आज इसी की तस्वीर बनाई जाय? मैं अपने चंचल मन को रोक ना सका और उस लड़की से इजाजत लेने उसकी तरफ चल पड़ा|

“ एक्सक्यूज मी| ”
“ जी कहिए| ”
“ आप और कितनी देर यहाँ पर है? ”
“ दरअसल मैं अपनी एक फ्रेंड का वेट कर रही हूँ| ”
“ ओह......अच्छा| ”
मैं सोच रहा था कि किस तरह इस लड़की से इजाजत ली जाये| तभी वह बोली-
“ पर आपने यह क्यूँ पूछा कि....... ”
“ दरअसल मैं सोच रहा था कि जब तक आपकी सहेली ना आ जाय, क्यूँ ना मैं आपकी एक तस्वीर बना डालूँ| ”
“ क्या आप एक आर्टिस्ट है? ”
“ शायद ऐसा ही समझिए| ”- मैंने मुस्कुरा कर कहा|
“ ठीक है, मैं तैयार हूँ| ”

और फिर वह लड़की अपने होंठों पर मुस्कान लिए एक खास मुद्रा में बैठ गई| इधर मैं रंगों को मिलाने लगा| मंद-मंद हवाएं उस लड़की की जुल्फों से खेल रही थी और इधर मेरी अंगुलियां कैनवास पर फिसलती जा रही थी| उसकी सहेली के आने से पहले ही मैंने पेंटिंग कम्प्लीट कर ली| मेरी बनाई हुई तस्वीर को उस लड़की ने बड़े गौर से देखा और फिर मेरी तरफ देखकर बोली-

“ क्या आपने यह मेरी तस्वीर बनाई है? ”
“ जी बिलकुल| ”
“ जरा गौर से देखकर बताईए| ”

मैं काफी अचंभित हुआ| मैं कभी उस तस्वीर को तो कभी उस लड़की को देखे जा रहा था| और तब जाकर बात मेरी समझ में आई| हर बार की तरह इस बार भी मैं अपनी कल्पना और वास्तविकता को पृथक नहीं कर पाया था|

“ वैसे तस्वीर चाहे जिसकी भी हो, आपने काफी अच्छी बनाई है| ”- वह लड़की बोली|
“ जी, शुक्रिया| ”
“ क्या आप इस लड़की को पहले से जानते है? ”
“ किस लड़की को? ”- मैंने अचरज से पुछ|
“ वही लड़की, जिसकी आपने तस्वीर बनाई है| ”
“ तो क्या सचमुच में ऐसी कोई लड़की है? ”
“ हाँ, बिलकुल| ”
“ कहाँ? ”
“ आप खुद ही देख लो| वो जस्ट आपके पीछे खड़ी है| ”

और फिर मैं पीछे की तरफ पलटा| सचमुच मेरे सामने एक लड़की खड़ी थी| यह उस लड़की की सहेली थी जिसका वह इंतज़ार कर रही थी| मैं इस लड़की को देखकर दंग रह गया| मुझे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था| ऐसा लग रहा था जैसे मैं कोई सपना देख रहा हूँ| बिलकुल वही आँखें, वही बाल, वही चेहरा, मेरी कल्पना से मेल खाती| एक तरफ वह निर्जीव तस्वीर तो दूसरी तरफ सम्पूर्ण अंगों वाली एक सजीव युवती| कैसा सुखद संयोग था| जिंदगी में ऐसे कितने मौके आते हैं, जब कोई इंसान अपनी कल्पना को बिलकुल सजीव रूप में अपनी आँखों के सामने पाता है? इस मामले में मैं बहुत खुशकिस्मत था| सच कहूँ तो आज एक चित्रकार अपनी चित्र से टकरा गया था; वो चित्र जो उस चित्रकार को परिपूर्ण बनाती है|


आज उस घटना को लगभग चार महीना होने जा रहा है जब मैं अपनी कल्पना से वास्तविक रूप में मिला था| आज वह चित्र अपने चित्रकार की बाहों में कैद है| बचपन से सुनता आया था कि ऊपरवाला सबसे बड़ा कलाकार है, हम सब तो केवल उसके हाथ की कठपुतली भर है| आज मुझे इस बात का प्रमाण भी मिल गया था| सचमुच ही ऊपरवाला सबसे बड़ा कलाकार है और एक कुशल चित्रकार भी| मेरी चित्रकारी तो उसके सामने कुछ भी नहीं| मैंने उसकी चित्रकारी का नमूना भी देख लिया है| अपनी बाहों में कैद उस अद्भूत चित्रकारी को मैंने जी भर कर देखा और फिर आसमान की तरफ सर उठाकर ऊपर बैठे चित्रकार का इतनी खूबसूरत चित्रकारी के लिए शुक्रियादा किया|