Monday, 15 June 2015

इन दिनों कुछ लिख नहीं रहा


इन दिनों कुछ लिख नहीं रहा,
सोचता हूँ आज कुछ लिखूँ|
मन की आँखों को खोलकर,
फिर से ये जहाँ देखूँ|
शायद फिर से एक बार,
कलम कुछ बदल सके|
जमाने के जहर को,
कागज़ पर उगल सके|
पर क्या-क्या बदलोगे तुम,
पूछ बैठी मेरी तमन्ना|
क्या तुम्हारी चाहत को पूरा,
कर पायेगी तुम्हारी रचना|
ज़माने की इस भीड़ में,
रचना कही खो ना जाये|
अरसे बाद जगी हूँ मैं,
ये तमन्ना कही सो ना जाये|
कहा मैंने धीरज रखो,
मैं तुम्हें सोने ना दूँगा|
बड़ी मुश्किल से ढूंढा है,
रचना को खोने ना दूँगा|
बस तुम दोनों एक होकर,
फिर से मेरा साथ दो|
सिमटी-सी पहचान को,
मिलकर एक आवाज़ दो|
अगर कुछ बदल ना सका,
फिर भी एक सबक तो दूँगा|
भले ही पूरा ना सही,
कम-से-कम एक हक तो लूँगा|
और फिर जाने कितने,
मैं मिलकर हम बनेंगे|
बूंद-बूंद स्याही से ही,
सैकड़ों कलम बनेंगे|
फिर हर एक तमन्ना को,
रचना का अवतार मिलेगा|
तब आएगा वो दिन,
जब बदला-सा संसार मिलेगा|

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