Monday, 15 June 2015

मैं देखता हूँ.....फिर मैं सोचता हूँ


हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर,
मैं देखता हूँ.....
शहीदों के मजारों पर फूल चढ़ते हुए,
आज़ादी के रखवालों को उन्हें सलाम करते हुए,
खून उबलते और भुजाओं को फड़कते हुए,
एक-एक सिपाही को मरने-मारने की कसमें खाते हुए,
फिर मैं सोचता हूँ.....
ये फूल सरहद पार क्यूँ नहीं भेजे जाते हैं,
हम कड़वी यादों को ही क्यूँ दोहराते हैं,
जो उस पार हैं हमारे ही भाई हैं,
अपने ही भाइयों को मारने की कसमें हम क्यूँ खाते हैं,
हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर,
मैं देखता हूँ.....
खादीधारी नेताओं को भाषण देते हुए,
आज़ादी का मतलब समझाते हुए,
धर्मनिरपेक्षता का पैगाम सुनाते हुए,
तालियों की गड़गड़ाहट पर इतराते हुए,
फिर मैं सोचता हूँ.....
क्या खादी का मतलब ही आज़ादी है,
धर्मनिरपेक्ष तो यहाँ की पूरी आबादी है,
फिर तालियों की गड़गड़ाहट कैसी,
क्या यहाँ का हर नेता गाँधीवादी है,
हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर,
मैं देखता हूँ.....
अमीर कहता है मैं आज़ाद हूँ,
गरीब कहता है मैं आज़ाद हूँ,
गाँव कहता है मैं आज़ाद हूँ,
शहर कहता है मैं आज़ाद हूँ,
फिर मैं सोचता हूँ.....
अफसर क्यूँ नेताओं की गुलामी करता है,
मकसद क्यूँ विजेताओं की गुलामी करता है,
हौसला क्यूँ डर की गुलामी करता है,
ईमान क्यूँ रिश्वत की गुलामी करता है,
मैं देखता हूँ.....फिर मैं सोचता हूँ|

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