Saturday, 13 June 2015

जज्बात न. 2

समंदर लाख हो गहरा,
मुझे उस पार जाना है...
ये मंज़िल हैं नहीं आसाँ,
फलक के पार जाना है...
कि कोई साथ दे ना दे,
कोई दो हाथ दे ना दे,
अकेले ही चला था मैं,
अकेले पार जाना है...!!!

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