Tuesday, 27 January 2015

चित्रकार

मुझे बचपन से ही चित्रकारी का बेहद शौक रहा है| सच कहूँ तो चित्रकारी केवल मेरा शौक ही नहीं, बल्कि मेरा वजूद है| हर इंसान के अपने अलग-अलग शौक होते हैं और ऐसे ही किसी एक शौक में जब जुनून का मिश्रण हो जाता है तो वह उसका वजूद बन जाता है| यही बात मेरे साथ भी थी| जहाँ तक मैं चित्रकारी को समझता हूँ तो यह केवल एक कला नहीं है| एक चित्रकार जब अपनी भावनाओं और रचनात्मकता को मिलाकर तूलिका के माध्यम से कैनवास के पन्नों पर एक सजीव आकार देने की कोशिश करता है तो चित्र का निर्माण होता है और एक चित्रकार की इसी खूबी को चित्रकारी कहते है| एक सम्पूर्ण चित्र केवल कई रंगों का मेल नहीं, बल्कि एक चित्रकार की सोच, उसकी भावनाओं और उसके सपनों का सम्मिश्रण होता है|

चित्रकारी का मेरा यह शौक दिन-ब-दिन परवान चढ़ता जा रहा है| इसकी कई वजहें हैं| एक तो मुझे सपनों में जीने की आदत है| दूसरी यह की मैं आर्थिक रूप से काफी समृद्ध कहा जा सकता हूँ; क्यूंकि मेरे पिताजी का बसाया हुआ काफी बड़ा बिजनेस है, इसलिए मुझे सपनों की दुनिया में खोने के लिए काफी वक्त मिल जाता है| बिजनेस में मेरी दिलचस्पी जरा भी नहीं है और ना ही मैं वक्त का पाबन्द हूँ| चित्रकारी के प्रति मेरी दीवानगी की जो सबसे बड़ी वजह है, वह है मेरे जेहन में कैद एक तस्वीर; जो कि बहुत स्पष्ट-सा नहीं है, और न ही मैं उससे कभी रूबरू हुआ हूँ| फिर भी वह मुझे प्रेरणा देती है, मेरी कल्पना को सहारा देती है और मेरी अँगुलियों को तूलिका पकड़ने तथा कैनवास पर फिसलने के लिए बाध्य करती है|

यूँ तो मैं हर तरह की तस्वीरें बनाता हूँ, परन्तु जब भी मैं किसी लड़की के अक्स को पन्ने पर उतारने की कोशिश करता हूँ तो हर बार मेरी अंगुलियां धोखा दे जाती है| बाकी सब कुछ तो ठीक-ठाक ही बनता है, परन्तु हर बार वही जुल्फें, वही नाक, वही ऑंखें और वही होंठ| मैं समझ नहीं पाता कि हर बार एक-सा चेहरा क्यूँ? आखिर कहाँ चूक हो जाती है? कहीं ये वही तस्वीर तो नहीं जो मेरी जेहन में कैद है? कहीं ये वही चेहरा तो नहीं जो मेरी सोच में धुँधली-सी है, मगर तूलिका के हाथ में आते ही मुझ पर हावी हो जाती है| कभी-कभी तो मैं खुद से ही सवाल करने लगता- ये महज एक कल्पना है या फिर हकीकत? मेरा दिल इसे केवल कोरी कल्पना मानने को तैयार नहीं था| और फिर मैंने अपनी कल्पना को वास्तविक दुनिया में ढूंढना शुरू कर दिया| हर रोज मैं अलग-अलग जगहों पर जाकर चित्रकारी करने लगा| कभी किसी नदी के किनारे तो कभी कुदरत की गोद में पर्वत-मालाओं की बीच, कभी किसी घने जंगल में तो कभी दूर तक फैले क्षितिज तले हरी घास के मैदान में|

रोज की भांति मैंने सारा सामान गाड़ी में डाला और अपनी कल्पना की खोज में निकल पड़ा| शहर के कोलाहल से दूर मैंने एक शांत जगह देखकर गाड़ी खड़ी की और चित्रकारी का सारा सामान लेकर सामने बगीचे की तरफ चल पड़ा| एक घने छायादार वृक्ष के नीचे मैंने अपना पड़ाव डाला| फिर एक सनसनी निगाह चारों तरफ दौड़ाई| दरअसल मैं उस लोकेशन को तलाश रहा था जिसकी तस्वीर उतार सकूँ| तभी मेरी निगाह सामने बेंच पर बैठी एक लड़की पर ठहर गई| मैंने सोचा क्यूँ ना आज इसी की तस्वीर बनाई जाय? मैं अपने चंचल मन को रोक ना सका और उस लड़की से इजाजत लेने उसकी तरफ चल पड़ा|

“ एक्सक्यूज मी| ”
“ जी कहिए| ”
“ आप और कितनी देर यहाँ पर है? ”
“ दरअसल मैं अपनी एक फ्रेंड का वेट कर रही हूँ| ”
“ ओह......अच्छा| ”
मैं सोच रहा था कि किस तरह इस लड़की से इजाजत ली जाये| तभी वह बोली-
“ पर आपने यह क्यूँ पूछा कि....... ”
“ दरअसल मैं सोच रहा था कि जब तक आपकी सहेली ना आ जाय, क्यूँ ना मैं आपकी एक तस्वीर बना डालूँ| ”
“ क्या आप एक आर्टिस्ट है? ”
“ शायद ऐसा ही समझिए| ”- मैंने मुस्कुरा कर कहा|
“ ठीक है, मैं तैयार हूँ| ”

और फिर वह लड़की अपने होंठों पर मुस्कान लिए एक खास मुद्रा में बैठ गई| इधर मैं रंगों को मिलाने लगा| मंद-मंद हवाएं उस लड़की की जुल्फों से खेल रही थी और इधर मेरी अंगुलियां कैनवास पर फिसलती जा रही थी| उसकी सहेली के आने से पहले ही मैंने पेंटिंग कम्प्लीट कर ली| मेरी बनाई हुई तस्वीर को उस लड़की ने बड़े गौर से देखा और फिर मेरी तरफ देखकर बोली-

“ क्या आपने यह मेरी तस्वीर बनाई है? ”
“ जी बिलकुल| ”
“ जरा गौर से देखकर बताईए| ”

मैं काफी अचंभित हुआ| मैं कभी उस तस्वीर को तो कभी उस लड़की को देखे जा रहा था| और तब जाकर बात मेरी समझ में आई| हर बार की तरह इस बार भी मैं अपनी कल्पना और वास्तविकता को पृथक नहीं कर पाया था|

“ वैसे तस्वीर चाहे जिसकी भी हो, आपने काफी अच्छी बनाई है| ”- वह लड़की बोली|
“ जी, शुक्रिया| ”
“ क्या आप इस लड़की को पहले से जानते है? ”
“ किस लड़की को? ”- मैंने अचरज से पुछ|
“ वही लड़की, जिसकी आपने तस्वीर बनाई है| ”
“ तो क्या सचमुच में ऐसी कोई लड़की है? ”
“ हाँ, बिलकुल| ”
“ कहाँ? ”
“ आप खुद ही देख लो| वो जस्ट आपके पीछे खड़ी है| ”

और फिर मैं पीछे की तरफ पलटा| सचमुच मेरे सामने एक लड़की खड़ी थी| यह उस लड़की की सहेली थी जिसका वह इंतज़ार कर रही थी| मैं इस लड़की को देखकर दंग रह गया| मुझे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था| ऐसा लग रहा था जैसे मैं कोई सपना देख रहा हूँ| बिलकुल वही आँखें, वही बाल, वही चेहरा, मेरी कल्पना से मेल खाती| एक तरफ वह निर्जीव तस्वीर तो दूसरी तरफ सम्पूर्ण अंगों वाली एक सजीव युवती| कैसा सुखद संयोग था| जिंदगी में ऐसे कितने मौके आते हैं, जब कोई इंसान अपनी कल्पना को बिलकुल सजीव रूप में अपनी आँखों के सामने पाता है? इस मामले में मैं बहुत खुशकिस्मत था| सच कहूँ तो आज एक चित्रकार अपनी चित्र से टकरा गया था; वो चित्र जो उस चित्रकार को परिपूर्ण बनाती है|


आज उस घटना को लगभग चार महीना होने जा रहा है जब मैं अपनी कल्पना से वास्तविक रूप में मिला था| आज वह चित्र अपने चित्रकार की बाहों में कैद है| बचपन से सुनता आया था कि ऊपरवाला सबसे बड़ा कलाकार है, हम सब तो केवल उसके हाथ की कठपुतली भर है| आज मुझे इस बात का प्रमाण भी मिल गया था| सचमुच ही ऊपरवाला सबसे बड़ा कलाकार है और एक कुशल चित्रकार भी| मेरी चित्रकारी तो उसके सामने कुछ भी नहीं| मैंने उसकी चित्रकारी का नमूना भी देख लिया है| अपनी बाहों में कैद उस अद्भूत चित्रकारी को मैंने जी भर कर देखा और फिर आसमान की तरफ सर उठाकर ऊपर बैठे चित्रकार का इतनी खूबसूरत चित्रकारी के लिए शुक्रियादा किया|

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